ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी

मैंने तुझे करीब से देखा है 

तेरे कुदरत के करिश्मे को रोज़ बदलते देखा है 

जैसे सुबह का सूरज अंधकार दूर करता है 

वैसे निराशा को उम्मीद में बदलते देखा है 

 

देखा है मैंने कैसे पंछी 

भोर पर घोंसले से निकलते हुए 

खाना ढूंढ़ने निकलते हैं 

वैसे ही मैंने बड़े जानवर को छोटे को कहते देखा है 

देखा है मैंने कैसे समुन्द्र अपने अंदर 

इतिहास छुपाये बहता है 

वैसे ही भविष्य अपने अंदर 

कई राज़ छुपाये बैठा है 

 

देखा है मैंने कैसे भंवरा फूलों पर मंडराता है

वैसे ही इंसान इस संसार रूपी भवर में फसता जाता है  

देखा है मैंने पांच तत्व को 

जीवन का निर्वाह करते हुए 

बिना मोल के अब कुछ देते हुए 

 और इंसान का उसकी बेकदरी करते हुए 

ऐ ज़िन्दगी तू कितनी अजीब है

रोज़ नए पहलु दिखती , ज्ञान का वो भंडार है 

ऐसा कर तू मेरी गुरु बंजा

रोज़ मुझे नया ज्ञान दे 

अपने नए नए रंगों से मुझे हैरान कर दे 

अगर जीवन एक यात्रा है 

और मै उसका एक मुसाफिर 

तोह बस तू मेरा ख़ामोशी से साथ दे।   

Reply