ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी

On

ऐ ज़िन्दगी मैंने तुझे करीब से देखा है  तेरे कुदरत के करिश्मे को रोज़ बदलते देखा है  जैसे सुबह का सूरज अंधकार दूर करता है  वैसे निराशा को उम्मीद में बदलते देखा है    देखा है मैंने कैसे पंछी  भोर पर घोंसले…

मैं 

On

मैं हूँ  तो सब कुछ है  मैं नहीं  तो कुछ भी नहीं  मैं सर्वव्यापी भी हूँ  और सर्वगुण सम्पन भी  मुझ में ही पंच तत्व भी है  मुझसे ही यह जंगल नदियों  पर्वतों और पक्षियों का निर्वाह भी  मैंने ही धरती उपजाओ…